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    Wednesday, 12 April 2017

    क्या दुनिया भर में ख़तरे में है लोकतंत्र

    नरेंद्र मोदी'लोकतंत्र ख़तरे में है'. ये जुमला आप अक्सर सुनते होंगे. कभी ममता बनर्जी से. कभी अरविंद केजरीवाल से. कभी कांग्रेस के नेताओं की ज़ुबान से.
    कभी बराक ओबामा को लोकतंत्र की फिक्र होती है. तो, कभी टेरीज़ा मे और एंजेला मर्केल लोकतंत्र बचाने की गुहार लगाती हैं.
    पूरी दुनिया में हंगामा सा है. लोकतंत्र ख़तरे में है...जम्हूरियत को बचाओ.आख़िर लोकतंत्र क्यों ख़तरे में है? उसे किससे ख़तरा है? सीरिया में बशर अल असद की सरकार, जब अपने ही लोगों पर ज़ुल्म करती है, तो लोकतंत्र को ख़तरा समझ में आता है.
    चीन की सरकार जब हॉंगकॉंग जैसे स्वायत्त इलाक़े में दखल देती है, तो लोकतंत्र पर ख़तरा समझ में आता है. ईरान, इराक़ और रूस में जब साफ़-सुथरे चुनाव नहीं होते, तो भी जम्हूरियत को नुक़सान पहुंचता है.
    मगर, यूपी के विधानसभा चुनाव में बीजेपी की जीत से लोकतंत्र को कैसा ख़तरा? जब अमरीका की जनता डोनाल्ड ट्रंप को राष्ट्रपति चुनती है, फिर डेमोक्रेसी को कैसा डेंजर? जब ब्रिटेन के लोग यूरोपीय यूनियन से अलग होने यानी ब्रेक्ज़िट के हक़ में वोट देते हैं, तो उसे भी लोकतंत्र के लिए ख़तरा क्यों बताया जाता है?जो मुल्क़ तानाशाही के शिकार रहे हैं, वो तो बदनाम हैं ही. जैसे रूस या मिस्र या ईरान में लोकतंत्र का सिर्फ़ नाम है. मगर अमरीका, ब्रिटेन जैसे देश जो सदियों से जम्हूरियत में जीते आए हैं, वहां लोकतंत्र क्योंकर कमज़ोर हो रहा है?
    मध्य-पूर्व और पूर्वी यूरोप के देश हों जो हाल में लोकतांत्रिक हुए थे, या फिर सदी से भी ज़्यादा पुराना जम्हूरी मुल्क़ तुर्की, हर जगह तानाशाही ने ज़ोरदार वापसी की है.
    आम लोगों के अधिकारों पर पाबंदियां लगाई जा रही हैं. राज करने वाले लोग इकतरफ़ा फ़ैसले ले रहे हैं. अपने हुक्मरानों पर जनता का भरोसा कम होता जा रहा है.लंदन की संस्था इकोनॉमिक इंटेलिजेंस यूनिट यानी आईईयू की योआन होई कहती हैं कि रूस और ईरान जैसे देश तो बदनाम ही हैं. अब लोकतंत्र को अमरीका और ब्रिटेन जैसे देशों में भी ख़तरा है.
    अमरीका की स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के राजनीतिक समाजशास्त्री लैरी डायमंड का कहना है कि लोकतंत्र का मिज़ाज बदल रहा है. ये रंग-रूप बदल रहा है. इसे लेकर ही पश्चिमी देश फिक्रमंद हैं.
    पिछले एक दशक में सारी दुनिया में जिस तरह के सियासी बदलाव हुए हैं, लोग उससे परेशान हैं.
    क्योंकि लोकतंत्र को एक बने-बनाए चश्मे से देखा जाता था. किसी भी देश में जम्हूरियत को एक ख़ास पैमाने पर तौला जाता था. इसीलिए आज दुनिया में जो बदलाव हो रहे हैं, उन्हें लोकतंत्र के लिए ख़तरा बताया जाता है.लैरी डायमंड कहते हैं कि लोकतंत्र पिछले एक दशक से मंदी के दौर से गुज़र रहा है. पूर्वी यूरोप और मध्य पूर्व के देशों में जहां लोकतंत्र की अलख जगी थी, वो फिर से तानाशाही के शिकंजे में कसते जा रहे हैं.ब्रिटेन की संस्था आईईयू यानी इकॉनमिस्ट इनटेलिजेंस यूनिट पिछले 11 सालों से दुनिया भर में लोकतंत्र को एक ख़ास पैमाने पर तौलती आई है. आईईयू लोकतंत्र के गिरते मेयार पर एक रिपोर्ट निकालती है, जिसका नाम है डेमोक्रेसी इंडेक्स.
    इस रिपोर्ट में क़रीब 167 देशों के हालात का ब्यौरा दिया जाता है. मसलन, वहां की सरकार कैसी है? नागरिकों को कितने अधिकार हासिल हैं? सरकार की नीतियां कैसी हैं? फ़ैसलों में जनता की भागीदारी कितनी है?

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